ईश्वर है महान
कोई नही महान,
जग शून्य सूना है इंसान,
कोई नहीं महान।।
ईश्वरी शक्ति का अंश,
बाकी सभी है भस्म।
जहां से आए वहां जाना पड़ेगा।
इस पंक्ति को गुनगुनाना पड़ेगा।
कोई नहीं महान,
जग शून्य और सूना इंसान ।
कोई नहीं महान।।
कवि ,कबीर ,रहीम, रैदास सहित,
केवल दिहिं चोट।
बड़े सामुदायिक श्रृंखला पर किया प्रतिकार ,
इसीलिए क्या वे हुए महान?
आ प्रकटा नया है खोजी,
करता है प्रहार । ,
उसके समय जो महान,
क्या यही है समाज ।
कोई नहीं महान,
जग शून्य और सूना इंसान,
कोई नहीं महान।।
देश विदेश में व्यापक भरे पड़े औजार,
शक्तिशाली देश करता है बखान।
हम ही हैं महान,
भ्रम में जी रहे प्राणी, अंत समय कोई नहीं पहचान।
वैदिक काल का एक ही मंत्र ,
वसुदेव कुटुंबकम, मिल कर रहे हम सब।
जो करे प्राणी-प्राणी में नाही भेद,
वही महान वही हैं श्रेष्ठ।
वह ईश्वर हैं जो बसा है सबके भीतर।
और कोई नही महान
जग शून्य और सूना इंसान।
कोई नहीं महान।।
सर्वश्रेष्ठ का यही कथन,
अपने अग्रजो का किया पतन।
श्रेष्ठ नाम की पहनी माला,
जीवन में नाम ही मसाला।
फिर उस श्रेष्ठ पुरुष का कथन,
पुराने कवियों का झूठा कथन।
बुनता है नई मधुशाला ,ईश्वरी शक्ति का उजाला।
और कोई नहीं महान,
जग शून्य और शमशान भी सून,
शमशान वासी महादेव ही शिव ।
शिव ही सत्य शिव ही सुंदर,
जगजीवन हम सब है बंदर।
और कोई नहीं महान,
जग शून्य और सूना इंसान,
ईश्वर है महान।।
अभिषेक त्रिपाठी
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