अभिषेक त्रिपाठी की पंक्तिया
कनक-कनक सब कहत, कंचन कहे ना कोई ।
सब कोई बुझत नाहीं, कंचन कनक एक होत।
जीवन एक जल का बुला, हवा रूपी काल।
मारे एक झोंका मिल जाए, यही पर जीवन-लीला समाप्त।
चरित्र नाम की झांकी, देखने में समान।
ईर्ष्या से बैरी बने, दया से दयावान।
गुण सब खोवत है, मानव एक मीन।
मिट्टी में मिल जात, कनक होत हीन।
क्षमा बड़न को, छोटों को उत्पात।
क्षमा करत प्रेम बढ़त, बड़ेन के यह काम।
गजब नगरिया नाटक का, एक एक बंदर आए।
देख तमाशा दुनिया का, बड़े बड़ाई गाए।
सत्य वचन सत्य नाव है, मूर्ख बसे चार और ।
मूर्खों से ना उलझहिये, उन्हें प्रमुखता दो।
ज्ञान खड़ा है मिट्टी का, सुंदर जीवन काल।
दुख-सुख में अंतर यही, विष-सुधा का साथ।
बड़े बड़ाई ना करे, चाहे कितनो तकलीफ।
छोड़ अटरिया भाग चले, हिमालय में लीन।
जनहु जान मनु देर लगाई,
पश्चात बन तमाशा, भीतरिया आग लगाई।
प्रातः उदय न होत सवेरा,
बीतत दिन एकदम अंधेरा।।
अभिषेक त्रिपाठी
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