हिंदी उपन्यास का उदभव और विकास
उपन्यास का अर्थ व परिभाषा-: उप- समीप ,न्याय- धरोहर शाब्दिक अर्थ- मनुष्य के समीप उसकी भाषा में रखी हुई धरोहर।
उपन्यास की परिभाषा:-
* श्यामसुंदर दास-"उपन्यास मनुष्यके वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा है।"
* प्रेमचंद- " उपन्यास मानव जीवन की समग्र कथा है मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके राशियों को खोलना उपन्यास का मूल तत्व है ।"
* जैनेंद्र- " उपन्यास एक गद्यमय आख्यान है जिसमें मानव के सुख एवं पीड़ा के वर्णन रहते हैं। पीड़ा में परमात्मा बसता है। मेरे उपन्यास आत्मपीड़न के साधन हैं।"
हिंदी का प्रथम उपन्यास
उपन्यास विधा का आगमन अंग्रेजी से बंगला, बांग्ला से हिंदी मे हुआ।
1-परीक्षागुरु (1882) लाला श्रीनिवास दास। (आचार्य शुक्ल, डॉ बच्चन ,डॉ नगेंद्र ,अज्ञेय।)
हिन्दी उपन्यासो का विकास क्रम
1- पूर्व प्रेमचंद युग- (1877-1918)
2-प्रेमचन्द युग-(1918-1936)
3-प्रेमचन्दोत्तर युग - (1936-अब तक)
*पूर्व प्रेमचंद युग- (1877-1918)
*मुख्य विषय - सामाजिक,जासूसी और ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना हुई।
मुख्य विशेश्तये-
१ - मनोरनजन प्रधान उपन्यास
२ - घटना प्रधान
३ - तिलिस्मी एवं जासूसी उपन्यास
४ - ऐतिहासिक उपन्यास
प्रमुख उपन्यासकार
श्रद्धा राम फुल्लोरि- भाग्यवती इस काल का प्रथम उपन्यास कहा जा सकता है। इसमें नारी जीवन की समस्या को कथा के रूप में लिया गया है।
बालकृष्ण भट्ट- नूतन ब्रह्मचारी,सौ अजान एक सुजान सामाजिक श्रेणी के उपन्यास है।
ठाकुर जगमोहन- 'श्यामा स्वप्न' इतिहास में स्वच्छंद प्रेम का चित्रण है।
राधा कृष्ण दास- 'निस्सहाय हिंदू' हिंदूओं की दयनीय में मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता का चित्र।
देवकीनन्दन खत्री- तिलस्मी एवं अय्यारी उपन्यासों के जनक इनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए गैर हिंदी भाषी प्रदेश के लोगों ने हिंदी पढ़नी प्रारंभ की चंद्रकांता, हिंदी का प्रथम तिलस्मी एवं अय्यारी उपन्यास है।
किशोरी लाल गोस्वमि- ऐतिहासिक उपन्यासों के जनक ह्रदय हरिणी या आदर्श प्रथम, ऐतिहासिक उपन्यास।
गोपाल राम गहमरी -जासूसी उपन्यासों के जनक।अद्भुत लाश, बेकसूर को फांसी, सर-कटी लाश, जासूस की भूल आदि।
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिओध-अधखिला फूल,ठेठ हिन्दी का गढ़
प्रेमचन्द युग (1918-1936)
मुख्य विषय - सामाजिक व ऐतिहासिक
विशेषताये:-
*चरित्रप्रधान उपन्यास की रचना
*समाज सुधार की भावना
*शोषण के विरोध
*मध्यमवर्गीय मानसिकता का चित्रण
*राष्ट्रवादी विचारधारा
*दलित व स्त्री चेतना
प्रमुख उपन्यासकार:-
प्रेमचंद :- प्रेमचंद ने उपन्यास विधा को सामान्य जीवन से जोड़ा। उनके उपन्यासों में नारी जाति, मजदूर व किसान वर्ग का संघर्ष ,जमीदारी प्रथा का मुख्य कथानक के रूप में लिया। सेवा सदन, वरदान,कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मंगलसूत्र इनका अधूरा उपन्यास हैं।
वृन्दावनलाल वर्मा - गढ़कुंडार,विराट की पद्मिनी, झांसी की रानी,मृगनैनी ,अहिल्याबाई।
जयशंकर प्रसाद - कंकाल, तितली ,इरावती इनका अधूरा उपन्यास है।
विशंभर नाथ शर्मा कौशिक - मां ,भिखारिणी, सामाजिक उपन्यास का आदर्शवाद की स्थापना।
शिवपूजन सहाय - देहाती,दुनिया।
सियारामशरण गुप्त - गोद,अंतिम आकांक्षा, जीवन।ये गांधीवादी उपन्यासकार है।
निराला- अप्सरा,अलका ,निरूपमा, प्रभावती, चोटी की पकड़ काले कारनामे
भगवती प्रसाद बाजपेई- प्रेमपथ, अनाथ,पत्नी ,मुस्कान, चलते-चलते, टूटते बंधन।
पांडे बेचन शर्मा 'उग्र'-चंद हसीनों के खतुत, दिल्ली का दलाल, बधुआ की बेटी ,शराबी ।
ऋषभ चरण जैन- पैसे का साथी, दिल्ली का व्यभिचार, मास्टर साहब, सत्याग्रह।
प्रेमचंदोत्तर उपन्यास (1936-अब तक)
*सामाजिक उपन्यास
*मनोविश्लेषणवादी उपन्यास
*साम्यावादी उपन्यास
*आंचालिक उपन्यास
*ऐतिहासिक उपन्यास
*महिला लेखाको द्वारा रचित उपन्यास
*दलित उपन्यास
सामाजिक उपन्यास
*मुख्य विषय - उपन्यासकारो ने सामाजिक समस्याओं के बारे में चिंतन करते हुए सकीर्ण मान्यताओं पर कड़ा प्रहार किए हैं।
प्रमुख उपन्यासकार -
भगवती प्रसाद बाजपेई - प्रेमचंद की आदर्श उन्मुक्त यथार्थवादी परंपरा का अनुसरण गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित हैं। पतीता की साधना, पियासा, त्यागमयी।
सियाराम शरण गुप्त- गोद, अंतिम आकांक्षा।
प्रताप नारायण मिश्र- विदा, विजया, विसर्जन।
भगवती चरण वर्मा- टेढ़े मेढ़े रास्ते, चित्रलेखा, आखरीदाव, सबही नचावत राम गुसाईं।
उपेंद्र नाथ अश्क - गिरती दीवारें, गर्म राख, बड़ी-बड़ी आंखें एक नदी कंदील।
अमृतलाल नागर -बूंद और समुद्र ,अमृत और विष, महाकाल।
श्रीलाल शुक्ल- राग दरबारी।
मनोविश्लेषणवादी उपन्यास :-इन उपन्यासकारों ने फ्राइड युग और एडलर के सिद्धांतों से प्रभावित होकर उपन्यासों की रचना की। उन्होंने मानव जीवन की विसंगतियों और समस्याओं के लिए बाहरी परिस्थितियों को दोषी ना मानकर अंतर मन की प्रवृत्तियों को ही दोषी माना है।
*मुख्य विषय :-दमित वासना, कुंठा व निराशा का चित्रण।
सामाजिक जीवन की उपेक्षा व अति व्यक्तित्वादिता को प्रधानता ।
नायिका प्रधान उपन्यासों की रचना।
मुख्य उपन्यसकार :-
जैनेंद्र - परख, सुनीता, त्यागपत्र विवर्त
इलाचंद्र जोशी- लज्जा, सन्यासी,पर्दे की रानी, जिप्सी, जहाज के पंछी ।
अज्ञेय - शेखर एक जीवनी,नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।
प्रभाकर माचवे- परंतु ,दर्द के पेबंद, सांचा।
नरेश मेहता - डूबते मस्तूल, यह पथ बंधु था, नदी यशस्वी है।
डॉ धर्मवीर भारती - गुनाहों का देवता ,सूरज का सातवा घोडा।
साम्यवादी उपन्यास :- यह उपन्यासकार मार्क्सवादी से प्रभावित है। इसी कारण पूजी पतियों और सामंतवादी शक्तियों का विरोध किया है तथा शोषित व सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हैं।
*विशेषताएं :-
१- मार्क्सवाद से प्रभावित
२- शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति
३- नारी के प्रति सम्मान के भाव
४- पूजीवादी व्यवस्था का विरोध
५- समकालीन विषमताओं का चित्रण
६- विश्व बंधुत्व की भावना
प्रमुख उपन्यासकार :-
यशपाल - झूठा सच ,दादा कामरेड, देशद्रोही ,तेरी मेरी उसकी बात।
रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' -चढ़ती धूप ,उल्का, नई इमारत
भैरव प्रसाद गुप्त - शोले, मशाल, सती मैया का चौरा
अमृतराय - बीज, हाथी के दांत ,धुआं, सुख-दुख
अमरकांत - सूखा पत्ता, आकाश पंछी, इन्हीं हथियारों से
मन्मथलाल वर्मा, यज्ञदत्त शर्मा , राघेय राघव आदि प्रमुख हैं ।
आँचलिक उपन्यास :- वे उपन्यास जिनमें ग्रामीण अंचल की मान्यताओं परंपराओं संस्कृति आदि का वही की भाषा में चित्रण किया गया हो।
प्रमुख उपन्यासकार -
देवेंद्र सत्यार्थी - रथ के पहिए, कठपुतली ,ब्रह्मापुत्र
नागार्जुन - रतिनाथ की चाची, नई पौध ,बाबा बटेश्वर नाथ
फणीश्वर नाथ रेणु - मैलाआंचल ,परती परिकथा, दीर्घ।
तथा श्रीलाल शुक्ल, शैलेश मटियानी, विवेक राय, रामदरश मिश्र, राही मासूम रजा, राजेंद्र अवस्थी आदि इस युग के प्रमुख उपन्यासकार हैं।
ऐतिहासिक उपन्यास :-ऐतिहासिक घटना या ऐतिहासिक पात्रों को आधार बनाकर इन उपन्यासों की रचना की गई। प्रमुख उपन्यासकार :-
हजारी प्रसाद द्विवेदी - बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्र लेख पुनर्वास, अनामदास का पोथा
वृंदावनलाल वर्मा -माधव राव जी सिंधिया, झांसी की रानी, महारानी दुर्गावती
आचार्य चतुरसेन शास्त्री- रक्त की प्यास, सोमनाथ अमर सिंह, आलमगीर ,सोना और खून ।
राघव राघव - मुर्दों का टीला,चीवर, राह ना रुकी।
महिला द्वारा रचित उपन्यास :-
हिंदी की प्रथम महिला उपन्यासकार साध्वी सती प्राण अबला को माना जाता है। 1880 ई० में सुहासिनी नामक उपन्यास की रचना की।
उषा प्रियंवदा - पचपन खंभे लाल दीवारें ,रुकोगी नहीं राधिका,शेष यात्रा।
कृष्णा सोबती - मित्रो मरजानी, सूरजमुखी अंधेरे के, जिंदगीनामा ,समय सरगम।
मन्नू भंडारी- आपका बंटी महाभोज।
ममता - कालिया, बेघर एक पत्नी के नोट्स।
मृदुला गर्ग - उसके हिस्से की धूप चित्रकोबर
मैत्रीयी पुष्पा - चित्र मुद्गल, मंजूर भक्त, मृणाल पांडे, राजी सेठ आदि।
दलित उपन्यास :-
प्रथम दलित उपन्यास जयप्रकाश कर्दम 'छप्पर '1994, ईस्वी।
प्रेम कपाड़िया -मिट्टी की सौगंध
मदन दीक्षित- मोती की ईट
सत्यप्रकाश- जस तस भई सवेर
मोहनदास नैमिशराय - मुक्तिपर्व, वीरांगना झलकारी बाई, आज बाजार बंद है
नीलेश रघुवंशी - एक कस्बे के नोट्स
अजय नावरिया - उधर के लोग।
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