रचना और आलोचना का संबंध

 रचना और आलोचना का रिश्ता द्वंदात्मक होता है। दोनों एक दूसरे के लिए अनिवार्य है। यह द्वंदात्मक ता पूंजीपति और सर्वहारा की तरह भी होती है और एक ही वर्ग में समानता थोड़ा एक से बेहतर दूसरे को बेहतर बनाने की चेष्टा के लिए होती है। इसमें वैमनस्य और मैत्रीपूर्ण दोनों द्वंद है। एक ही वस्तु की यह दोहरी पहचान एक पहचान अनुसंधान मूलक होकर वस्तु के रचने की तरह दूसरे की वस्तु को पहचानते हुए अनुसंधान मूलक होने की।

  रचना से जुड़ाव ही आलोचना को सही व्याख्या और विश्लेषण तक ले जाता है। आलोचना से स्वस्थ साहित्य के प्रयोजन को ही स्पष्ट नहीं करती बल्कि पाठक की रूचि में भी परिष्कार करती है और रचना तथा रचनाकार को सही दिशा प्रदान करती है। आलोचना एक साथ आलोचक, रचनाकार और पाठक के भीतर नीर -क्षीर -विवेक का परिमार्जन करती है। 

रचना और आलोचना का संबंध और विकास साहित्य की एक ऐसी विकास यात्रा है जिसमें समय और सरोकार का हस्तक्षेप उत्तरोत्तर बढ़ता गया। इसमें एक तरफ किसी कृति को देखने समझने की दृष्टि व्यापक हुई है तो वहीं नए मूल्यों को भी अहमियत हासिल हुई है। आलोचना की नई समझ और नए सरोकारों के बीच खुले पाठ के तर्क के साथ आज आलोचना की पुरानी परंपरा नया आकार ले रही है।

 एक सहज एक सजग रचना अपने गुण संवेग का जिम्मेदार बयान होती है और एक तक आलोचना उस बयान की ईमानदार गवाही है।

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