आलोचक के गुण और दायित्व
आलोचना का साहित्यिक महत्व इसलिए अधिक हैं,क्योंकि वह शायद रचना के गुण दोषों का निष्पक्ष भाव से मूल्यांकन करने मे सक्षम होती है, मात्र जिस व्यक्ति के द्वारा यह कार्य किया जा रहा है। उस आलोचक के द्वारा बुद्धि पक्ष के आधार पर कृतिका मूल्यांकन कर उसे योग्य न्याय दिलाने की कोशिश होती है आलोचना का कार्य जिन जिम्मेदारियों वाला होता है अतः आवश्यक बन जाता है कि उसे करने वाले आलोचक के गुणों को परखा जाए अच्छा आलोचक बनने के लिए निम्न गुणों का होना आवश्यक है -
1-सहृदयता :- आलोचना के लिए सबसे आवश्यक गुण है। यह सा हृदय ता निषेधात्मक और योगात्मक दोनों रूपों में आवश्यक है। आलोचक में कृतिकार व उसके प्रति पूर्वाग्रह का अभाव होना चाहिए। द्वेष ईर्ष्या आदि से रहित हो कृति में व्याप्त गुणों पर रखने की शक्ति आलोचक में होनी चाहिए। कवि की अंतरात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने की संवेदना आलोचक का मुख्य गुण है। मुक्त ह्रदय से काव्याकृत में तन्मय होकर गुणों पर रिझता हुआ आलोचक अपनी आलोचना प्रस्तुत कर सके वह सहृदय आलोचक हैं।
2 - विस्तृत ज्ञान :- यदि आलोचक को आलोच्य विषय तथा लोक और शास्त्र का व्यापक एवं सूक्ष्म ज्ञान होगा, तो वह वर्ण- विषय की बारीकी को समझ ही नहीं पाएगा।उस में गुण दोष निकालना तो दूर की बात है।
आलोचक का इतिहास ,दर्शन, काव्यशास्त्र, समाजशास्त्र आदि का विस्तृत ज्ञान ही आलोचना को सशक्तता प्रदान करता है और कृति की विशेषताओं का विवेचन करने में सहायक होता है । सूक्ष्म एवं गंभीर ज्ञान से ही आलोचना न तो कवि और उसकी कृति के लिए महत्वपूर्ण है न हितकारक है।
3-निष्पक्षता :- सहृदयता के साथ निष्पक्षता के मेल बिना आलोचक किसी कृति की आलोचना से न्याय नहीं कर सकता है। अपने परिचितों एवं आत्मीयो की कृतियों में उसके अच्छे गुण ही दिखाई देंगे और अन्यों की कृतियों में दोष ही दिखाई देंगे। इस प्रकार पक्षपात आलोचक का बहुत बड़ा दोष है आलोचकों न्यायाधीश के समान नीर -क्षीर, विवेक समान होना चाहिए ।आलोचक का यह गुण सूक्ष्म बुद्धि और चरित्र दोनों में होता है।
4- प्रेरणा दृष्टि :- आलोचक को व्यक्तिगत कृति की आलोचना के साथ समय-समय पर सामूहिक रूप से साहित्य को प्रेरित करने वाले विचार प्रकट करने चाहिए। यह आलोचक के लिए आवश्यक उदात्त सामाजिक और कलात्मक दृष्टि से संवेदना रखने वाला गुण है। इस दृष्टि के साथ युग की बदलती चेतना का भी संवेदना उसमें होनी चाहिए। जिससे वह प्राचीन अथवा नवीन कलाकृतियों की युगनुरुप व्याख्या कर सकें।
5-प्रतिभा:- ज्ञान एवं अध्ययन के पश्चात भी जिस महत्व शिव धनुष को उठाने का काम आलोचक करता है,उसे प्रतिभा के बिना और पूर्ण नहीं कर सकता ।प्रतिमा ही आलोचक को रचना का विवेचन सतर्कता एवं प्रभावशाली ढंग से पूर्ण करने में सहायता करती है। प्रतिभा उसके कार्य में निखार लाती है ।
6-निर्णय की क्षमता :- आलोचक रचना के जिन गुण-दोषों का विवेचन करता है, उसके लिए रचना के प्रति सही निर्णय लेना आवश्यक है।आलोचक रचना के प्रति जो निर्णय ले रहा है, उस पर स्थिर रहने की क्षमता उसमें हो। वह इसलिए और अधिक आवश्यक बन जाता है क्योंकि उसे न तो रचना और उसके रचनाकार के प्रति पाठक के मन में नकारात्मक भाव पैदा करना है ,न उस रचनाकार को उसके पथ से विचलित करना है । अतः योग्य निर्णय की क्षमता आलोचक का महत्वपूर्ण गुण है।
7-अभिव्यक्ति कौशल:- आलोचक के सभी गुणों में यह गुण अत्यधिक आवश्यक माना जा सकता है। क्योंकि जिस कार्य को आलोचक कर रहा है उसकी यथा योग्य अभिव्यक्ति ही वह न कर पाया, तो उसके श्रम किसी मूल्य के नहीं।बिना अभिव्यक्ति कौशल की आलोचना प्रभावहीन हैं।ऐसी आलोचना तो पाठक पर प्रभाव डाल सकती है, न रचनाकार के कर्म के लिए विशेष योगदान दे सकती है।
इनके अलावा रचना के प्रति सहानुभूति,बुद्धिमता,औचित्य का ज्ञान, निर्भयता,गंभीरता ,स्थिरता ,उत्साह ,परिश्रम आदि आलोचक के लिए आवश्यक गुण है।
उपयुक्त सभी गुणों में संपन्न होने के बाद ही आलोचक अपने दायित्व को पूर्ण कर पाएगा।
लेखक- अभिषेक त्रिपाठी
सहयोग कर्ता- अतुल जी
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