शमशेर प्रेम और सौंदर्य के कवि


 शमशेर बहादुर सिंह हिंदी साहित्य में एक ज‌टिल नाम उन लोगों के लिए हैं जो एक किताब या महज कुछ कविताओं से किसी कवि को समझने की कोशिश करते हैं। कविता के सच को शब्दों के साथ स्वीकार करने वाले लोगों के लिए शमशेर कवियों के भी कवि कहलाते हैं। डॉ रंजना अरगड़े की किताब 'कवियों के कवि शमशेर' में पहली ही पंक्ति में लिखा है कि शमशेर अत्यंत जटिल काव्य संवेदन और सूक्ष्म शिल्प-संभार वाले श्रेष्ठ और विशिष्ट कवि हैं।  वास्तव में शमशेर के संपूर्ण साहित्य का आकलन अभी पूरी तरह से नहीं किया गया है। 


उनकी चर्चा साहित्य जगत में होती रही है लेकिन उन पर गहन कार्य नहीं हुआ। दरअसल शमशेर बहादुर हिंदी कविता के आत्मीय और दुरूह कवि माने जाते हैं। उनकी संवेदना का आकाश सचमुच में असीम है। शमशेर की कविताएं जितनी पढ़ी जाएंगी उनका उतना ही सार सामने आता जाएगा। जो जितना ज‌टिल होता है वह समझने पर उतना ही सरल हो जाता है। शमशेर प्रगतिवाद और प्रतीकवाद के समन्‍वित मापदंडों से बाहर नहीं हैं। वह साम्यवाद से भी दूर नहीं हैं। उनकी कविताओं में समकालीन देश और वातावरण का समुचित संयोजन है। 

राष्ट्रीय संग्राम के दौर में वह साम्यवाद को भी अपनी कविताओं में स्पष्ट करते रहे हैं। राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम के फलक में वह निजी संदर्भों पर भी अपनी लेखनी चलाते हैं। 1944 में ग्वालियर में मजदूरों पर हुए गोलीकांड को वह द्रवित होकर अपनी कविताओं में बयां करते हैं। 1946 में मुंबई दंगों पर भी वह लिखते हैं। कश्मीर को लेकर उनके विचार आजादी के समय काफी मुखर रहे हैं। शमसेर बहस और स्पष्टीकरण से भी बचते रहे हैं। वह एकांगी विचारधारा को पोषित करने के बजाय समन्वय पर जोर देते हैं। मानव धर्म, एकता, शांति, प्रेम, सौंदर्य और आशावाद उनकी कविताओं का मूल उत्स है। शमशेर का दिल बड़ा है। वह समकालीन कवियों की कविताओं की समीक्षा भी करते हैं। उन पर तटस्‍थ होकर टिप्पणी करने से उनको कोई गुरेज नहीं है। शमशेर की काव्य रचनाओं की एक झलक उनकी इस कविता में समाहित है। 

काल,
तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू-
तुझमें अपराजित मैं वास करूं।
इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूं
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो-
कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं-तेरे भी, ओ' 'काल' ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल !


जो मैं हूं-
मैं कि जिसमें सब कुछ है...

क्रांतियां, कम्यून,
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं ।

मैं, जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है
('काल तुझ से होड़ है मेरी'
नामक कविता-संग्रह से-साभार कविता कोश)
प्रयोगवाद और नई कविताओं के अग्रणी कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म 13 जनवरी 1911 को हुआ था। शमशेर के पास हिंदी तथा उर्दू की बराबर पकड़ थी। अज्ञेय और शमशेर दो अलग-अलग दिशाओं के ध्वजवाहक हैं। अज्ञेय जहां वस्तु और रूपाकार के बीच संतुलन स्‍थापित करते हैं वहीं शमशेर में शिल्प कौशल के प्रति अतिरिक्त जागरुकता है। शमशेर की कविताएं आधुनिक काव्य-बोध के अधिक निकट हैं, कविताएं ऐसे बिंबों के साथ आती हैं कि उसमें पाठक तथा श्रोता के सहयोग की स्थिति कायम है। उनका बिम्बविधान एकदम  'रेडीमेड' नहीं है। वह 'सामाजिक' आस्वादन को पूरी छूट देता है। उर्दू की गज़ल से प्रभावित होने पर भी उन्होंने काव्य-शिल्प के नवीनतम रूपों को अपनाया है। शमशेर बहादुर सिंह का निधन 12 मई 1993 को हुआ था। 

शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी साहित्य में कोमल और मांसल सौंदर्य के लिए पारखी नजर रखे हुए हैं। या यूं कहें कि वह आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा के समर्थक रहे हैं। प्रेम और सौंदर्य की उपासना शांति के लिए उनका शगल है। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी निजी चीज़ की तरह अपनाया। शमशेर के विरह गहरे और स्‍थायी ‌थे। एकांत पथिक की झलक उनमें दिखती हैं। वह अवसरवादी नहीं है। वह विचारों को छोड़ते नहीं ना ही उनको जल्दी से पकड़ते, बल्कि वह तो उन कवियों में से थे जिनके लिए मार्क्सवाद और भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कोई विरोध नहीं था। यह एक ही प्रारूप के दो फलक हैं। 

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