आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि

 हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट आलोचकों अथवा समीक्षकों के अस्तित्व प्रयासों से हिंदी साहित्य आज विषय साहित्य के क्षेत्र साहित्य में गिना जाता है। हिंदी साहित्य के कुछ अच्छे उच्च कोटि के समीक्षकों के कारण हिंदी साहित्य विश्व के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले सहायकों की कोटि में आता है। उन गिने-चुने आलोचकों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम सर्वोपरि गिना जाता है। 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल मूर्धन्य विद्वान के साथ-साथ एवं स्वतंत्र चिंतन एवं विश्लेषण थे। उन्हें भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का ज्ञान था तथा अपने स्वतंत्र चिंतन के कारण हिंदी आलोचना की दिशा प्रदान करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


रस मीमांसा एवं चिंतामणि-1 तथा चिंतामणि-2 आज उनकी प्रसिद्ध आलोचनात्मक रचनाएं हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल बहु आयामी प्रतिभा के स्वामीध उनकी आलोचनात्मक दृष्टि को निम्न शीर्षकों के अंतर्गत विभाजित किया जा सकता है। 

क- आचार्य शुक्ल की सैद्धांतिक समीक्षा 

ख- आचार्य शुक्ल की व्यवहारिक समीक्षा

उपर्युक्त दो भागों को विभाजित उनकी आलोचना दृष्टि को समझना सरल होगा।

 आचार्य शुक्ल को सैद्धांतिक समीक्षा सिद्धांतों को सरलता से समझने के लिए निम्नलिखित उप शीर्षकों मे बांटा जा सकता है। 

1-  रस तथा रसानुभूति :- आचार्य शुक्ल हिंदी के साथ-साथ संस्कृत के भी अच्छे विद्वान थे। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र में भरतमुनि से लेकर पंडित जगन्नाथ तक के सभी आचार्यों विद्वानों के रक्त संबंधी विचारों का गहन अध्ययन किया और अपनी सरलतम सूरत संबंधी अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने पुरातन रसानुभूति को नए वैज्ञानिक आधार पर परखा। उन्होंने विभाव, अनुभाव,संचारी भाव, स्थायीभाव आदि पर सूक्ष्मता से विचार किया और रस संबंधित कुछ नई उद भावनाएं प्रस्तुत की भाव के वे प्रत्यक्ष अनुभूति तथा वेग युक्त प्रीति का संशोधित रूप स्वीकार करते हैं।

2- रस का स्वरूप :- आचार्य शुक्ल रस की अनुभूति को अलौकिक मानता है तथा प्राचीन संस्कृत के आचार्यों ने रस को अलौकिक तथा ब्रह्मानंद सहोदर आदि माना है।जिसे शुक्ल मात्र औपचारिक ही मानते हैं उनका मानना है कि रस का संबंध अलौकिकता से ना होकर सीधे रूप में अलौकिक अनुभव से है। 

3 -साधारणीकरण:- आचार्य शुक्ल ने रस निरूपण की विवेचना करके जनसाधारण तक रस निरूपण और रस निष्पत्ति की प्रक्रिया को सरल बना कर प्रस्तुत किए हैं। साधारणीकरण की स्थिति में कवि तथा पाठक के बीच में व्याप्त द्वैत-भाव मिट जाता है। कवि का मन, सबका मन और कवि की अनुभूति सभी की अनुभूति बन जाती है। 

4 - काव्यानंद और उसके सोपान :- आचार्य शुक्ल काव्यानंद को लौकिक मानते हैं। इसे लोक मंगल की संज्ञा भी देते हैं। इस आनंद की व्यवस्था को दो भागों में बांटा है। 

क- लोकमंगल की साधनावस्ता

ख- लोकमंगल की सिद्धावस्ता

इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई देती है।

5 -कल्पना एवं सौंदर्य :- आचार्य शुक्ल ने सौंदर्य को वस्तुवादी, लौकिक एवं जीवन से प्रत्यक्ष संबंध मानकर उसे सामाजिक भूमि पर प्रतिष्ठित किया है। 

6 :-प्रकृति चित्रण :- आचार्य शुक्ल के प्रकृति चित्रण संबंधी विचार भी मौलिक  है। उनका मानना है कि वाक्य में प्राकृतिक दृश्य हमारे सामने आलंबन रूप में और उद्दीपन रूप में उपस्थित हो सकते हैं। 

7 -रीति निरूपण:- आचार्य शुक्ल रीत निरूपण वामन से भिन्न है। उनके विचार आनंद वर्धन व पाश्चात्य विद्वान पेंटर से प्रभावित है। 

8 -वक्रोक्ति निरूपण :- आचार्य शुक्ल ने चिंतामणि-1 में वक्रोक्ति तथा चमत्कार को अनिवार्य माना है।  

9-व्यवहारिक समीक्षा :- शुक्ल ने सैद्धांतिक आलोचना व व्यवहारिक आलोचना में सामंजस्य स्थापित की। व्यवहारिक आलोचना उनके ग्रंथ गोस्वामी तुलसीदास, हिंदी साहित्य का इतिहास जायसी ग्रंथावली एवं भ्रमरगीत सार में स्पष्ट दिखाई देता है।

 इसे दो वर्गों में बांटा है -

*कवियों पर लिखी गई समीक्षाएं

*काव्यधारों पर लिखी गई समीक्षाएं


आचार्य शुक्ल ने अपने समय के श्रेष्ठ कवियों पर अपनी व्यावहारिक समीक्षा प्रस्तुत की है। तुलसी उसके प्रिय कवि और रामचरितमानस प्रिय ग्रंथ है सूर काव्य को भी उन्होंने प्रशंसा तो की परंतु सामाजिक नैतिक आदि कारणों से विष्णु दास के प्रति तनिक कठोर प्रतीत होते हैं। काफी धाराओं पर भी उनकी समीक्षा बड़ा महत्व रखती है। छायावाद, रहस्यवाद, आदि पर उनका व्यवहारिक समीक्षा बहुत सुंदर है।

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