डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी की आलोचना
स्वतंत्रता के बाद हिन्दी काव्यालोचन में रामस्वरूप चतुर्वेदी की भूमिका प्रतिनिध आलोचक के रूप में रहीं है उनकी आलोचना में विफलता वैविध्य और कर्म कौशल तीनों चरितार्थ हुए हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी के लिए स्वाधीनता एक ऐसा मूल्य रहा है कि जिसे उन्होंने हर कीमत पर चाहे वह मध्यकालीन काव्य संवदेना हो या आधुनिक काव्य संवदेना जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी आलोचना न केवल सार्वजनिक है बल्कि गहरे अर्थ में समाजिक सांस्कृतिक समीक्षा भी है। उनकी यही समीक्षा दृष्टि भक्तिकाल के विकास को कुछ यों रेखांकित करती है। “ भक्तिकाव्य हिन्दी समाज की उदारतम चेतना का दस्तावेज हैं कबीर , जायसी , सूर , तुलसी , मीरा , इस युग के श्रेष्ठ कवि हैं यह मान्यता सर्वस्वीकृत है इसका निहितार्थ है कि यहाँ हिन्दू मुसलमान ब्राह्ममण दलित , पुरूष , स्त्री समाज के सभी वर्गो का साझा रचना कर्म है। भले वे वर्ग समान्य तौर पर समाज में अपना अलगाव बनाये रखते हैं यों हिन्दी जीवन की व्यापक समरसता का अन्यतम प्रमाण है हिन्दी भक्ति काव्य फिलहाल भक्ति के आवरण में सब समान थे। जबकि समाज में जाति , लिग धर्म प्रदेश देश के आधार पर आज भी भेद किए जा रहे हैं। यानी भक्तिकाल की श्रेष्ठता को कालावादी एवं प्रगतिवादी दोनों स्वीकार करते है। इस अंतर को भासिक संवेदना के धरातल पर ही समझा जा सकता है। ”[ 38 ] वास्तव में रामस्वरूप चतुर्वेदी अपनी आलोचना में सामाजिक सांस्कृतिक लेखन को महत्ता प्रदान की है इस तरह के लेखन को वे बड़ा रचना कर्म मानते हैं।
उपसंहार
उपर्युक्त विवेचन से यह सिद्ध होता है कि हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में – डॉ . रामस्वरूप चतुर्वेदी का स्थान अग्रणी आलोचको की पंक्ति में लिया जा सकता है। चतुवेदी ने अपनी आलोचना विषयक - दृष्टि जो पहले पहल भाषा की संवेदना पर लगायी वह उनकी मौलिक दृष्टि कही जा सकती है क्योंकि इसके पूर्व हिन्दी साहित्य का कोई आलोचक भाषा की संवेदना संबंधी आलोचना नहीं किया जिसे चतुर्वेदी जी ने किसी साहित्यिक रचना का प्रमुख अंग माना है क्योंकि हम सब जानते हैं कि किसी काल की कोई भी रचना कितनी ही क्यों न उच्चकोंटि की मानी जाय पर यदि उसकी भाषा में वह सहजता , सरलता , बोधगम्यता न हो तो उस कृति को उच्चकोटि की कहना ना समझी कही जायेगी। चतुर्वेदी जी ने हिन्दी आलोचना को मनुष्य के जातीय जीवन और उसकी संस्कृति से जोड़ कर देखा - परखा है।
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