हिंदी आलोचना की पृष्ठभूमि

 हिंदी आलोचना आज एक स्वतंत्र और समृद्ध गद्य विधा के रूप में स्वीकृत है। अन्य गद्य विधाओं की तरह आलोचना का विकास भी आधुनिक काल में भारतेंदु युग से ही माना जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि भारतीय आचार्य काव्य सौंदर्य के विधायक तत्वों का निरूपण नहीं कर सकते थे। वस्ततः भारती आचार्यों ने काव्य के सौंदर्य-विधायक तत्वों को लक्षित और परिभाषित करने के प्रयत्न में स्वतंत्र सिद्धांत ग्रंथों की रचना की थी। वह काव्यशास्त्र निर्माता थे। कभी विशेष व्यक्ति विशेष के रखना सौंदर्य के विश्लेषण में उनकी रुचि नहीं थी। उन्होंने रस, अलंकार, रीति,वक्रोक्ति, औचित्य और ध्वनि,सिद्धांतों की मीमांसा करते हुए काव्य के ब्राह्य और आंतरिक सौंदर्य के आधारभूत तत्व का स्वरूप निर्दिष्ट किया था। उनकी स्थापना आज भी प्रासंगिक हैं और हिंदी आलोचना ने अपने विकास के प्रत्येक चरण में उनसे। प्रेरणा और शक्ति ग्रहण की है। आधुनिक काल से हिंदी आलोचना का आरंभ मानने का अर्थ यह है कि हिंदी के साहित्य मनीषियों में कभी विशेष व्यक्ति विशेष का अध्ययन करने के बाद उसके महत्व और मूल्य का प्रतिपादन करते हुए स्वतंत्र रूप से प्रबंध या निबंध लिखने की शुरुआत आधुनिक काल में की। 

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। अतः हिंदी आलोचना के स्वरूप का निर्दिष्ट करने के लिए हमें इसी युग में अपने विचार यात्रा आरंभ करनी होगी। 

भारतीय युग में हिंदी आलोचना का आरंभ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हुआ। आलोचना का उत्कृष्ट उदाहरण इस काल में नहीं मिलता। 'हिंदी प्रदीप' (1877से 1910) ही एक ऐसा पत्र था जो अपेक्षाकृत गंभीर आलोचनाएं प्रकाशित करता था। पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षा के रूप में प्रकाशित होने वाली आलोचनाओ के अतिरिक्त इस युग में तीन प्रकार की आलोचनाओं का अस्तित्व भी स्वीकार किया जा सकता है।

1-रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों की परंपरा में  सैद्धांतिक

 2-आलोचना ब्रज भाषा एवं खड़ी बोली गद्य में लिखी गई थी। गांव के रूप में प्रसिद्ध आलोचना।

3- इतिहास ग्रंथों में कवि परिचय के रूप में लिखी गयी आलोचना।

 प्रथम वर्ग के अंतर्गत पिंगल,अलंकार ,रस ,नाटक तथा संपूर्ण काव्यशास्त्र इन सभी विषयों का पर लक्षण ग्रंथों की रचना की गई। उदाहरण स्वरूप ज्वालास्वरूप कृत 'रुद्रपिंगल'(1869), उमराव सिंह कृत 'द्वंद महोदधि'(1878),जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत 'छन्दप्रभाकर'(1894)  और जगन्नाथ दास रत्नाकर कृत 'घनाक्षरी-नियम- रत्नाकर '(1897) इस युग में रचित पिंगल ग्रंथ है। संपूर्ण काव्यशास्त्र को दृष्टि में रखकर लिखे गए लक्षण ग्रंथों में जानकी प्रसाद का 'काव्य सुधाकर'(1886) उल्लेखनीय है। नाट्यशास्त्र संबंधित सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति भारतेंदु का 'नाटक'( 1883) है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्राचीन अर्थशास्त्र की जानकारी कराने के साथ ही युग प्रवृत्ति का ध्यान रखकर प्राचीन जटिल शास्त्रीय नियमों को को छूट लेने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।

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